जलती हुई चिता की वो प्रीति जो पुरी नहीं हो पाई

हम नदी के इस किनारे
तुम नदी के उस किनारे
डोर आपस में बंधी है
प्रीति बंधन के सहारे।

प्रेम है ऐसा नशा ही
जो कभी जाता नहीं है
देख लूं उनको न जब तक
प्यासे हैं अरमां हमारे।

यह विरह की वेदना
मन से कभी हटती नहीं
मद भरी मीठी नजर की
आश भी लगते हैं न्यारे।

चांदनी में मैं अकेला
देखता हूं राह प्रिये की
रूपसि का पा के दर्शन
जाएंगी दिल में बहारें।

है तड़पता दिल हमारा
याद में मैं जल रहा हूं
शीघ्र आ इस पार प्रियतम
देख फिर सारे नजारे।

चाहे हों कांटें डगर में
नैया हो चाहे लहर में
पार कर लूंगा उसे मैं
होंगे जब तेरे इशारे।

पलामूं काव्य कुंज कोकिल कवि सत्येन्द्र चौबे सुमन की काव्य कृति ‘बादल हैं तो बरसेंगे ही’से संकलित।
नी

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