कल्पना ऐसी भी

तितली की तरह उड़ूँ गगन मे फूलों की पंखुड़ियों मे दौड़ लगाऊं

जो देखे गलत द्रष्टि से फिर फूलों मे छिप जाऊँ

कभी सोंचती गिलहरी बनकर तेज तेज दौड़ लगाऊं देखु सबको एक नजर से अपने पर एतराउ

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