जब हम खुद का मंथन करते हैं गंभीरता से

समय का फेर देखो कहां कभी एक पल का भी समय नहीं मिलता था अपने लिए सारा समय जिन्हे हम अपना मान लेते हैं उनके लिए गुजार दिया करते थे

कभी ये भी नहीं सोंचा था की यहाँ भी कोई है जो अपने से भी अपना है वो हम खुद है अपने है अपनो से परे है परंतु फिर भी दुनिया की भीड़ मे हमने अपने को न पहचाना और पता नहीं किसी और या किस घडी का इंतजार करते है, खुद ही रोते हुए अपने आपको समझाते गए कहते गए बस अब कितना कुछ गुजर गया है थोड़ा सा ही तो बाकी है

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