उसी तरह हम भी है अबोध जो संसार की सारी बातों से अनभिज्ञ रहते हैं और जो हमारी भौतिक जगत की वस्तुएँ हैं उन्हे अपना मान लेते है और जब वो वस्तुएँ हमसे या) अलग हो जाती हैं तो हम प्रतिकूल प्रक्रिया करने लगते है
जो वस्तुएँ हमे मिली हैं उनका तो विलीन होना संभव ही है चाहे हम हँसे या रोयें उनका जाना तो एक दिन तय ही है
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