धर्म और समाज, साहित्य के साथ



मानव सभ्यता की विकास-यात्रा के समानांतर साहित्य की यात्रा भी चली है। हमारे पास प्राचीन साहित्य को समझने- परखने के लिए इतिहास की गहराई है। इस गहरे तल में हमें आदिकालीन कवियों, साहित्यिक मनीषियों से परिचय होता है। इससे पूर्व कालिक इतिहास भारतीय संस्कृति के मंथन का काल था। जहां हमारा परिचय तथागत के अवतरण की सुखद घटना से होते हुए आदिगुरु शंकराचार्य के वेदांत- अवेदान्त की प्रासंगिकता से होती है। इस मार्ग से गुजरते हुई समाज, सत्ता और साहित्य का अटूट नाता का प्रमाण मिला है। कभी साहित्य से समाज को तो कभी समाज से साहित्य को पोषक तत्व मिलता रहा है। बौद्ध शासकों ने जब बुद्ध दर्शन का उपयोग सत्ता प्राप्ति के निमित्त करने लगे तब बौद्ध धर्म भी उसी तरह भाव शून्यता का शिकार हो गया जिस तरह कर्म कांड,यज्ञ, हवन में उलझ कर वेदांत मार्गी हो गये थे। इस दौरान एक और युग पुरुष का अवतरण हुआ जो विश्व में आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। शंकराचार्य ने आध्यात्मिक रुप से बिखरे समाज का एकीकरण किया। उन्होंने बौद्ध और वेदान्त के भावशून्य ज्ञान दर्शन को चुनौती दी तथा समाज के समक्ष वेदों के मूल और जीवंत रुप की स्थापना की जहां भावनाओं के साथ ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म की पुनर्स्थापना हुईं। आध्यात्मिक जागरण का अंतिम युग पुरुष स्वामी विवेकानंद जी हुए। कविगुरु रवीन्द्र नाथ टाइगोर से किसी विदेशी ने भारतीय संस्कृति संबधी जब प्रश्न किया तो कविगुरु ने उस अतिथि को स्वामी विवेकानंद जी के पास जाने का आग्रह किया। साथ ही यह भी कहा कि स्वामी विवेकानंद इस संदर्भ में मुझसे बहुत अधिक जानते हैं। दो मनीषियों का मिलन! रवीन्द्रनाथ साहित्य- संगीत के’ तो विवेकानन्द आध्यात्मिक जगत के तुंग शिखर पर विराजमान थे। साहित्य सदैव अध्यात्म के पीछे रहा है, अनुगामी की तरह। अध्यात्म ज्ञान भी साहित्य ही है। स्वामी विवेकानंद के समय विश्व अनेक उथल- पुथल से गुजर रहा था। एक तरफ औद्योगिक क्रांति थी, एक तरफ सत्ता का संघर्ष था। एक तरफ समाजिक क्रांति थी। स्वामी विवेकानंद जी ने इन विकट परिस्थितियों में नवजागरण का शंखनाद किया। भारत में छूआ छूत,ऊंच नीच, हिन्दू मुस्लिम, बाल-विवाह, सती प्रथा आदि सामाजिक मंथन से गुजर रहा था। अध्यात्म ज्ञान इन्सान के विचारों को आसमान की तरह हल्का बनाता है। साहित्यिक बोध अध्यात्म ज्ञान के भारशून्य गगन का हल्का पतंग है। सामाजिक नैतिक चेतना समीरन है जो अध्यात्म और साहित्य का वाहक, संचारी व्यवस्था है। सत्ता को इन्हीं नभ,वायु और पतंग से ऊर्जा मिलती है। या यूं कहें ऊर्जा मिलनी चाहिए। ऐसी ही सत्ता लोकहितार्थ सावित हुईं।
मेरे कहने का तात्पर्य है जिस काल खंड में अध्यात्म, साहित्य और सत्ता का सही तालमेल था वह काल सर्वाधिक उन्नत था। सर्वांगीण विकसित समाज था।इसका उदाहरण चंद्रगुप्त का मगध साम्राज्य है। चाणक्य की नीति, धर्म का प्रखर पूंज, साहित्य कला का श्रेष्ठ बिंब।
आज साहित्य दिग्भ्रमित हो गई है।आज साहित्य के पास कोई ठोस जमीन नहीं है। साहित्य के पास लेखन का विषय नहीं है। साहित्य लूंज- पूंज हो गई है। सत्ता, दर्शन, साहित्य आपस में टकरा रही है।इसका कारण साफ है। अध्यात्म का क्षेत्र बिखर चुका है। धर्म अपने- अपने मतों की स्थापना के लिए लड़ रहा है। हिंदू मुस्लिम, सिख ईसाई, एक धर्म दूसरे धर्मों को तर्क, प्रज्ञा की जीवंत शक्ति पर नहीं अपितु मूल्य हीनता के कट्टर कपट पूर्ण सोच से धर्म की आड़ में अधार्मिक अनर्गल सत्ता क़ायम करने में लगे हैं। धर्मान्तरण भी इसी श्रेणी में आती है।आदि काल में ज्ञान से दर्शन को चुनौती दी जाती थी। सार्थक परिचर्चा होती थी। फिर सहर्ष स्वीकार किया जाता था। पहले परिचर्चा का शास्त्रार्थी ज्ञान पिपासु होते थे। अतः ज्ञान का रस जहां मिला उधर को हो जाते थे। हिन्दू समाज या हिन्दू दर्शन काफी लोचक और कोमल है। वेदमार्गी से बौद्ध पंथ को सहज स्वीकार किया। बौद्ध दर्शन जब शंकराचार्य के अद्वैतवाद से शिकस्त खाने लगी तब पुनः वेदों का विशुद्ध संस्करण शंकराचार्य के रुप में हुआ। सनातन धर्म भी अनेक उथल-पुथल से गुज़र चुकी है।
सनातन धर्म का अर्थ यह नहीं है कि एक पंथ को मान कर चिपक जाए। सनातन धर्म अटूट है क्योंकि यह सदैव सत्य की ओर जाता है। इसका ज्वलंत उदाहरण लाखों साल की यात्रा है। बौद्ध से विवेकानंद तक का सफर। सनातन चिंतन में ज्ञान को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। सनातन धर्म अंध आस्था विश्वास नहीं है। सनातन धर्म में लचीलापन और कोमलता है। इन्हीं गुणों के कारण हिन्दू समाज सभी धर्मों के साथ मिलकर रहते आए हैं। सनातन धर्म न हिन्दू,न मुस्लिम,न सिक्ख,न ईसाई है। सनातन धर्म निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यह सिद्धांतों की डाली पर बैठ कर ठहर नहीं जाता है। यह किसी डाली पर तब तक बैठा रहता है जबतक वह डाली हरी है। अर्थात धर्म के मूल स्वरूप में जब तक प्रेम,क्षमा, कोमलता, करुणा का दाना मिलता है तब तक यह पंछी रुकता है। यही सनातन का दिव्य गुण है। समाज जब सैकड़ों साल की यात्रा करते हुए दुषित होने लगती है तब उस प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए समाजिक क्रांति होती है।इस क्रान्ति में धर्म अपने पुराने केंचुल उतार फेंकती है। बौद्ध से विवेकानंद के सफ़र में जो धार्मिक बदलाव दृष्टिगोचर हुआ है उसके मूल में सनातन धर्म की गतिशीलता और लचीलापन नजरिया है। किसी भी समाज का निर्माण धर्म से होता है। धर्म से फलता- फूलता है, धर्म से शासित समाज का अर्थ यह कदापि नहीं कि हिन्दू- मुस्लिम धर्म की स्थापना हो। धर्म से तात्पर्य किसी सम्प्रदाय से नहीं है। धर्म का अर्थ जो धारण करने योग्य हो। शिकागो के सर्व- धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद ने जिस हिंदू धर्म के अंधहीनता का,जिस प्रकाश पूंज का उद्घोष किया था उसके दायरे में दुनिया के सभी उर्वर प्रज्ञा शक्ति का प्राकट्य हुआ था। मैं आज के उस हिन्दू -मुस्लिम तथाकथित धर्म की बात नहीं कर रहा हूं जो आपस में धर्म की आड़ में सत्ता तो कभी सत्ता की आड़ में धर्म का अनुचित पोषण करता हो।

समाज का दूसरा पक्ष साहित्य जगत है। अध्यात्म के आलोक का विखंडन और विकेंद्रीकरण के कारण साहित्य भी बंट चुकी है। कारण साहित्य के संचरण के लिए अध्यात्म का विस्तृत और हल्का क्षितिज था। साहित्य भावना और बौद्धिक संपदा का मिश्रित शक्ति है। बौद्धिक संपदा औद्योगिक क्रांति में खो चुकी है। भावनाओं को यानी साहित्यिक उड़ान के रास्ते कुंठित हो गये हैं। साहित्य का फोकस बहुआयामी हो गया है। आजादी के पूर्व स्वतंत्रता आंदोलन लेखन के मूल में था। गांधी जी के सत्य- अहिंसा के इर्द-गीर्द साहित्य विचरण करती थी। इसी दौरान भारत में कालमार्कस का सिद्धांत भी भारतीय जनमानस को प्रभावित करने लगा था। पूर्ण संगठित न होकर भी आजादी के समय साहित्य बहुत संगठित थीं।आज का साहित्य असंगठित है। संगठित ऊर्जा एक साथ किसी बिंदु पर पड़ती है तो उसे पिघलाने की शक्ति रखतीं है। आज़ का साहित्य कभी प्राचीन शौर्यपूर्ण गाथा, शोषित पीड़ित, समाज, चरित्र प्रधान, गज़ल, मुकरियां, काल्पनिक झूठी मनगढ़ंत कहानी आदि विषयों तक घूम कर रह गई है। ऐसा नहीं है अच्छी साहित्य आज बिल्कुल मर चुकी है। अच्छे लेखक कवि नहीं हैं। बहुत कम ऐसे हैं जिनको वंदन अभिनंदन।

धर्म और साहित्य जब आसमान के टूटे सितारों की तरह गिरता है तब सत्ता निरंकुश हो जाती है। फिर तो सत्ता मानवीय मूल्यों की आड़ में धर्म और साहित्य दोनों को अपना कृत दास बना लेती है।

धर्म, साहित्य, सत्ता ये तीनों पैर टूट चुके हैं। समाज के तीनों चरण जब टूट जाते हैं तब चलता है व्यापार। छद्म व्यापार। सत्ता का व्यापार।लेखन का व्यापार।
सामूहिक शक्ति का ह्वास होने से निजी जीवन असुरक्षित और भयसंक्रमित हो जाता है। फिर हर व्यक्ति सत्ता चाहता है। स्वतंत्र सत्ता। कहीं मीडिया का धंधा, कहीं गुंडागर्दी, कहीं अफरातफरी।

जरुरत है आज एक ऐसी शक्ति का जो समाज के तीनों अंग- धर्म, साहित्य और सत्ता का एकीकरण करे।यह वीर पुरुष जहां से निकले वह समाज का होगा। हिंदू से या मुस्लिम से पर वह पूर्ण स्वतंत्र होगा। उसका चित्त स्थिर होगा। गांधी जी ऐसे ही युग पुरुष थे। गांधी, टैगोर,विवेका का मिलन ही धर्म, साहित्य और सत्ता का संगम है। प्यार का संगमरमर है।

मैंने अपने लेखन की यात्रा आदि शंकराचार्य से इसलिए की क्योंकि वे एक सच्चे साहित्यकार भी थे। आठवीं सदी में अवतरित शंकर की माता विशिष्टता और पिता शिवगुरु हुए। गुरुश्रेष्ठ गोविंदपाद के परम् तेजस्वी शिष्य शंकर ने मात्र बारह वर्षों की अल्पायु में ही ब्रह्मसूत्र, ग्यारह प्रमुख उपनिषद, और भगवद्गीता का भाष्य लिखकर अमर हो गये थे। उन्होंने ब्रह्मविषयक परस्परविरोधी व्याख्याओं में ऐक्य स्थापित करके यह दर्शाया कि चिरंतन सत्य एक है। उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक असम से कामरुप तक मठों की स्थापना की। हजारों किलोमीटर की लंबी यात्राएं कर अपने ज्ञान का प्रकाश विश्व में फैलाया। मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में बड़ी जिन्दगी देकर सन 830 ई. में हमें भारत का विरासत देकर चले गए।

आज दिशाविहीन धर्म, साहित्य सत्ता और टुअर समाज को किसी का इंतजार है….कब आओगे❤❤🌹🌹

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