सनकी

जलाकर शहर खामोश घर आके बैठ गए
सपने कुर्सी के आंखो में सजा के बैठ गए

वो कहते थे शम्स खुद को नए जमाने का
चिंगारी से डर के दामन बचा के बैठ गए

बड़े ही दरियादिल है वे बड़े ही खुशमिजाज है
न जाने कैसे कैसे लिबास सिला के बैठ गए

प्रेम की तो बातें सिर्फ किताबों मे ही रह गई
वो नफ़रत का इक दरिया बहा के बैठ गए
दरिया नफरत का बहाकर जो दिल मे भरा था
और जोशीमठ में बस्तियां हिला के बैठ गए

दिल ऐसा भरा नदी पहाड़ जंगल से”सरल”
वो अपने ही चारो तरफ बनावटी फुलवारी लगाकर बैठ गए



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