पुराने घाव मैं जब भी याद करती हूँ


धोखा देने लगते हैं शहर के लोग
तब अपना गाँव याद करती हूँ

चलते चलते थक जाता हूँ जब
तब पेड़ों की छांव याद करती हूँ

कैसा नासमझ बन गई हुमै
स्टीमर पर बैठ नाव याद करती हूँ

हंसते हुए जता जाते हैं अपनापन
अकेलेपन में वो भाव याद करती हूँ

आज भी बचपन की छुट्टियां और
दादी के घर मे बिताए दिनों को याद करती हूँ

जब कभी निराशा में थक जाता हूँ
अपनों के दिए घाव याद करती हु ❤❤❤
🌹🌹

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