बिखर सी जाती हूं कभी खुद में ही
कभी समेट लेती हूं खुद को खुद में ही
कभी असमंजस सी की डगर पर
चल निकलती हूँ अनजान राहों पर
कभी घंटों बैठी रहती हूं मौन
कभी बच्चों सी खिलखिलाती हूँ
कभी बैठ नदिया किनारे बहा देती हूँ
अपने जज्बातों को बहते पानी में
कभी बांध लेती हूँ खुद को
अतीत की सुन्दर यादों के बंधन में
कभी ये यादें छलक जाती हैं
आंखों से मोतियों की लड़ी बनकर
कभी नये बनते टूटते बंधनों में ही
ढूंढती रहती हूं खुद को घंटों
खुद से ही समेटे हुए खुद को
कभी खुद से जुदा करते हुए🌹🌹
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