कुछ अपने माँ बाप के कर्मो से और कुछ अपने खुद के कर्मो से इंसान परेशान है, पढ़ने के समय खेल करता रहा, प्रयास नहीं करता है आलस्य कूट कूट कर भरा है मेहनत करने के समय वो आराम से सोता रहा किस्मत का दोष है पर किस्मत इंसान खुद ही तय करता है न ठीक से पढ़ता है, न कोई प्रयास करता है और दोष सारा भगवान और किस्मत को देता है
वह कितना परेशान है एक रोटी के लिए
रोटी की खान है पर वहां पहुंच नहीं पाता
ऐसा नहीं कि वह प्रयास नहीं करता है
पर पहुंचने से पहले दरवाजा बंद हो जाता
रोटी नहीं कपड़े नहीं मकान भी नहीं है
फिर भी लड़ रहा है अपनी जिंदगी की लड़ाई
रोज शर्मिंदा होता है अपने ही बच्चों के सामने
न रोटी का जुगाड होता न होती कोई कमाई
लेकर सुई धागे हाथ में फटा रोज सिलता है
काश कोई समझ पाता इसकी क्या विवशता है
है जोड़ता टूटे सपनों को सुबह सबेरे रोज
नहीं समझता कोई भी वह कैसे सिसकता है
कभी रंग भरी होली आती आती कभी दिवाली
ऐसे अवसर पर भी उनकी खाली रहती झोली
वो सपने एक ही देखा करते रोटी,,रोटी, रोटी
थक हार कर बढ़ जाते, फिर वो अपनी खोली
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