सिर्फ एक अनोखा अहसास

🌿🌷घंटी बजने के साथ ही
फ़ोन की स्क्रीन पर
उभरता है तुम्हारा नंबर

वह नंबर…जो कभी सेव किया ही नहीं
ना ही कभी याद करने की
कोशिश ही की

सच कहूँ तो
कोई पूछे कभी
तो बता भी न पाऊँगी
न तो तुम्हारा नंबर
और ना ही तुम्हारा चेहरा

लेकिन एक क्षण में ही
पहचान जाती हूँ
के यह तुम हो
कँपकपातें हाथों से फोन उठा
जब सुनती हूँ
तुम्हारी “हैलो”
मुहर लगती है मेरे ख़यालों पर

तुम पूछते हो
“कैसी हो,
कह भी दो, जो भी कहना है”

मैं अपने दिल की धड़कनें सँभालते हुए कहती हूँ,
“सब ठीक है यहाँ
और कहने-सुनने के लिए
कुछ भी बाक़ी नहीं अब”

मगर जानते हो
जाने कितनी बातें सहेज रखीं हैं मैंने
जो तुम्हें और
सिर्फ़ तुम्हें ही बतानी हैं

कल शाम एक नन्हीं गौरैया आई थी अटारी पर,
घंटे भर तुम्हारा नाम लेकर चहचहाती रही

घर के पीछे वाले पेड़ पर
अब कोयल कूकने लगी है
लगता है बौर लगने को हैं

जानते हो मेरे दोस्तों ने फिर से
मेरे वेजिटेरियन होने का मजाक उड़ाया
मैं झूठ-मूठ कुछ देर तक रूठी रही

कल बेवज्ह फिर मैं किसी से उलझ पड़ी थी
अब ये न कहना कि तुम तो पागल हो

वो जो जाॅन एलिया साहब की किताब है न,
अटकी रहती हूँ मैं
कई-कई दिनों तक एक ही ग़ज़ल पर

ये जो ख़बरें छाईं हैं न अख़बारों और न्यूज़ चैनल्स में,
ज़रा हम साथ बैंठे
तो अपनी ख़बरें बनाते मिलकर उनके अंदाज़ में

मेरी सबसे अच्छी सहेली बहुत नाराज़ है मुझसे
इस बात पर,
कि मुझे अब तक तुमसे मुहब्बत है

साँस लेना एक रस्म है
और ख़ुली आँखों से सपने देखना ज़ुर्म

मैं चुप रहती हूँ
तुम्हारा फ़ोन रखकर घंटों रोती हूँ
लोग कई दिनों तक मुझसे
मेरी सूजी हुई आँखों का सबब पूछते हैं
मैं बहाने बनाती हूँ
बड़ी मशक़्क़त से
मैं होंठों को नकली मुस्कान का जामा पहनाती हूँ

महीनों की
मौन प्रतीक्षा
और
उसके बाद एक दिन
फिर से तुम्हारा फ़ोन आता है🌿🌷

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