ठाकुर वीर सिंह, सौम्य सिंह और उनके आदमी डाकुओ के बताए हुए रास्ते पर चल निकलते हैं पैदल ही
धूप थी पर कुछ हवा भी चल रही थी
झाड़ियाँ थी कांटे उनके कपड़ो को चीर रहे थे
कभी कभी हाथों मे भी लग जाते थे
बहुत दूर दूर तक चलना था
पहाड़ी के ऊपर
ऊँची नीची पहाड़ी थी
रात मे बरसात होने के कारण उनमे फिसलं भी थी
तभी वीरसिंह का एक आदमी पहाड़ी से फिसल गया और जमीन मे जा गिरा सौम्य और सारे आदमी उस आदमी की तरफ दौड़े तभी उसने कहा मालिक चिंता मत करो हम ठीक है अब आगे की ओर चलो
और वो वीरसिंह का सहारा लेकर आगे की ओर चलने लगता है
तभी वो देखता है की कुछ महिलाएं वहाँ से कुछ खाली डालियाँ लेकर आ रही थी
उन सबको देखकर वो सब ठिठक कर रुक गई और उन सबको देखने लगी
अरे कहाँ जा रहे हो तुम लोग भैया इस भयानक जंगल मे , महिलाओ ने पूंछा
हम अपने अड्डे पर जा रहे हैं जो पहाड़ी के ऊपर है हमारे सरदार डुंगर ने हमे कुछ काम के लिए भेजा था उसी काम के लिए
अच्छा कौन सा काम जरा हम भी सुने एक महिला बोली
सौम्य के आदमी ने कहा की मैं तुम्हे जानता हु तुम वहाँ जाती आती हो ना सरदार को सब्जी और जरूरत का सामान देने
तो ये काम है एक आदमी को पकड़ने के लिए भेजा था मुझे हमने इसको पकड़ लिया है और अब इसे सरदार के सामने पेश करना पड़ेगा
सरदार इसे सजा देंगे
❤❤❤ कृमशः

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