उम्मीद कितनी भारी पड़ती है जीवन मे



उम्मीदे जब हद से बढ़ जाती हैं,,तभी वह कुछ जंजीरे साथ लाती हैं,,,

और उन जंजीरों में इंसान जब खुद को बंधा पाता है,, तभी वह आजाद होने के लिए दौड़ लगाता है ,,,

जंजीरों से खुद को आजाद करने के लिए हर संभव कोशिश में ,,वह सबसे पहले उन रिश्तो से ही निजात चाहता है ,,,जिसमें वह खुद को बंधा पाता है,,,

इसी दौड़ में और आस में वह यह भूल जाता है ,,कि( सोच) में बदलाव कर उम्मीदों को आधा किया जा सकता है,,, नजरिए का इलाज कर (नजर) बदल जीवन को साधा जा सकता है,,,,

पर कुछ बेचैनियों के तले दबा इतना सोच नहीं पाता है ,,,या तो खुद को अकेला कर जाता है ,,,या फिर दूसरे रिश्ते अपना कर खुद का अकेलापन मिटाता है,,,,,

कुछ बदला, कुछ वहीं रह गया,,, कुछ बदला, कुछ वहीं रह गया,,,

उम्मीदों का काफिला तो फिर से खड़ा हो गया,,,

गौर फरमाइए,, गौर फरमाइए ,,,
अपनी सोच को और नजरिए को बदले बिना हम दूर तक नहीं जा पाएंगे,,, क्योंकि हम भावनात्मक पुतले हैं ,,,,,,
जब भी किसी वस्तु या व्यक्ति से दिल लगाएंगे ,,,,,अपनी उम्मीदे फिर से बढ़ाएंगे ,,,

और हो सकता है ,,बदले में खुद को फिर से वहीं पर खड़ा पाएंगे ।।।।

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