कविता रचूँ या लेख लिखूं,
नित नित नव विचार कहाँ से लाऊँ मैं,
सोच की भी तो कुछ क्षमता है,
विस्तार कहाँ से पांऊ मैं ।
मन कल्पनाओं में उड़ता रहता है,
पर आयेगा तो लौटकर धरती पर,
यथार्थ चित्रण यदि करना है
कर्म भूमि पर उतरूँ मैं ।
असहायों की मदद करूं,
दीन दुखियों के दुख में खड़ा रहूँ,
बच्चों के समुचित शिक्षा में,
कुछ भागीदारी निभाऊँ मैं ।
सत्य मार्ग पर सदा चलूँ,
समाज की सेवा में तत्पर हों,
कर्म भूमि पर सदा डटूँ,
अपना कर्तव्य निभाऊँ मैं ।
आयेगी लेखनी में धार तभी,
स्वतः सरपट वह दौड़ेगी,
नव सुन्दर सृजन तभी होगा,
माँ शारदे का आशीर्वाद पाऊँ मैं ।
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