मै देखती हु
रोज शाम अपनी
अकेली सी
ठंडी सांस भरते हुए
एक कराह सी उठती है
वो शाम भी गुजर चुकी
कितनी शामें गुजर चुकीं
कोई एक सी नहीं
निकलती गई
कुछ चुभती रही
कुछ आराम वाली
कुछ हैरान करने वाली
कुछ याद आने वाली
कुछ ऐसी जिन्हे याद करने से
मन घबराता है
और कहता है मत याद करो वो शाम
तकलीफ की वो शाम
अभाव की वो शाम
याद करो वो शाम
जो एक अच्छी याद बनकर आई
मन मे खुशियाँ लाई हुई वो शाम
जो याद करने को हरदम
व्याकुल रहती है पर मन को पीड़ा नहीं देती
ठंडक देती है
😊😊😊😊
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