ये कविता कितनी सत्य लिखी है आलम जी ने

शहर मे मोल है सभी के अनमोल
गांवो मे आज भी मिलाप बाकी है

वहा नुक्कड़ पे सजती है महफिले
गांवो मे आज भी चौपाल बाकी है

रंगिनीयो मे बसे होते है हमेशा शहर
गांवो मे आज भी चादंनी रात बाकी है

बिखरते जा रहे है रोज रिश्ते वहा तो
गांवो मे अभी भी बुजुर्गो के अरमान बाकी है

जरूरतो से होती है रिश्तेदारी वहा अब तो
गांवो अभी भी ,मानवता का पहचान बाकी है

फरेब का हुनर हावी होता जा रहा है आज वहा
गांवो मे आज भी इन्सानियत का निशान बाकी है

हर शैय की लगाई जाती है कीमत वहा आज
गांवो मे आज भी मोहब्बत का पैगाम बाकी है

अक्सर खाई जाती है नींद की गोलीया वहा
गांवो मे अभी भी शकुन की नींद बाकी है

शहर मे किसी को किसी से वास्ता नही होता
गांवो मे आज भी उल्फत भरी तकरार बाकी है

आलम

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