जब मेरा बचपन था तब मैं बहुत गरीब थी अपनी उम्र के बच्चो को खिलौने खेलते हुए सोंचती की काश ऐसी गाड़ी मेरे पास भी होती पर गाड़ी क्या ठीक से खाने को ही नहीं मिलता था
फटे कपड़े पहने हुए खुद से ही शर्माती और एक कोने मे बैठ जाती
पैरो मे टूटी चप्पल पहनकर कही जाती थी
मै भी बहुत कुछ चाहती मैं भी अंदर ही अंदर घुट घुट कर रहती
किसी बच्चे की रंग बिरंगी साइकिल देखकर मेरा भी मन लालचाता की काश मेरे पास भी ऐसी साइकिल होती मैं भी पार्क मे चलाती सब मेरे पीछे पीछे भी दौड़ते
जब मेरे स्कूल मे कोई प्रतियोगिता होती तो मै उसमे शामिल न होती कारण की मेरे पास कपड़े न होते
किसी शादी विवाह मे मै न जाती ये सोंचकर की सब अच्छे अच्छे कपड़े पहनकर आएंगे और मै वही पुरानी एक फ्रॉक और घिसी चप्पल पहनकर जाऊंगी
मेरा मन लहगा चुनरी पहनने का होता सब लड़कियाँ खूब सुंदर सुंदर कपड़े पहनकर आती मै सिर्फ अपने कपड़ो को देखा करती और कही अकेले मे कम रोशनी मे खड़ी रहती
मेरा मन भी नाचने का होता सब बच्चे शादी मे नाचते और मै एक कोने मे खड़ी रहती
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