भीतर के अंकुरो पर काबू रखो जो पल पल पनप रहे हैं

बताशा फुट रहा है किसे क्या पता की कौन तुमको लूट रहा

तिल तिल मरते हो घुट घुट कर आहे भरते हो

जरा पता लगाओ

की कौन ऐसा है जो तुम्हे चैन नहीं लेने देता

वही लालच का अंकुर जो मन मे पल रहा

मोह का अंकुर जीने नहीं देता

बदले की भावना का अंकुर भी चैन से मरने नहीं देता

काम वासना का अंकुर सच्चा अपना सच्चा साथी

की पहचान करने नहीं देता

दूसरों से जलन का अंकुर प्रगति करने नहीं देता

काबू मे करो इन अंकुरो को तुम

जो तुम्हे चैन से रहने नहीं देता

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