आपके तर्ज पर अर्ज है …. वो बड़े घर से तालुकात रखती थी ,इसलिए ऊंची अपनी औकात रखती थी , हम भी तो गलियों के शहजादे थे आसमां से चांद लाने के वादे थे पूरी नहीं कभी ये दास्तां हुईंक्या मुहब्बत भी कभी इतनी आसान हुई

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