कितनी सुंदर कविता है

आपके तर्ज पर अर्ज है ….
वो बड़े घर से तालुकात रखती थी ,
इसलिए ऊंची अपनी औकात रखती थी ,
हम भी तो गलियों के शहजादे थे
आसमां से चांद लाने के वादे थे
पूरी नहीं कभी ये दास्तां हुईं
क्या मुहब्बत भी कभी इतनी आसान हुई
( मरुधर …..)

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