इनकी भी एक दुनिया

एक मुर्दा अपने अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहा था एक दम अकेला पड़ा था शमशान मे

उसके परिजन उसे छोड़ कर पता नहीं कहाँ चले गए थे तेज धूप थी

वो दुखी था की हाय जिन लोगो के लिए उसने कितनी मेहनत की, तिनका तिनका जोड़ कर, अपने आराम की परवाह न करके, पैसा कमाया, घूस लेकर इन्हे खिलाया, घर बनवाया, अपने लोगो की जमीन हड्पि कितना कुछ किया इन लोगों के लिए पर ये लोग आज मुझे छोड़ कर कही चले गए

उसको मरे अभी 12 घंटे नहीं हुए थे

अतः उसने सोंचा की एक बार मै अपनी चेतना को जगाऊँ और देखु की बाहर क्या हो रहा है

उसका सूक्ष्म जीव बाहर निकला अपने शरीर को देख रहा था जो मृत पड़ा था

चारो तरफ एक अलग संसार था कोई किसी को नहीं जानता था

सारी लाशे अपना इंतजार कर रही थी😔

उनके कपड़े एक तरफ शरीर से अलग पड़े थे

दूर आग जल रही थी वो सूक्ष्म जीव सबको देख रहा था अचानक उसकी नजर अपने परिजनों पर पड़ी जो एक छाव मे कुर्सी पर बैठे हुए थे उसने उनके मनोभावों को टाटोला तो उसका बेटा सोंच रहा था की अभी कितनी देर लगेगी

मृतक के और परिजन फोन मे बात कर रहे थे

कुछ थोड़ी दूर पर चाय पी रहे थे

और बेटे सोंच रहे थे की बड़ी मुश्किल मे मरा ये

अब संपति का आनंद मिलेगा काफी संपत्ति छोड़ गया है

तभी सूक्ष्म जीव सोंच रहा था की उस दुनिया से तो अच्छी ये दुनिया है इसमें कोई दर्द नहीं, रोग नहीं, अशांति नहीं, भूख नहीं, प्यास नहीं इतनी देर से शरीर धूप मे पड़ा है उसमे धूप की कोई तपिश नहीं

कोई अपना नहीं शरीर अब क्या है मैने तो मोक्ष को पा लिया अब तो मुझे इस शरीर से भी क्या

यहाँ का माहौल भी अलग है उस दुनिया का अलग है यहाँ लोग तप कर रहे है

इंसान भौतिक सुखो को पाने के लिए कितना अनुचित कार्य करता है कितनी लूट खसोट करता हैं

तभी उसका नाम पुकारा जाता है की अंतिम संस्कार की तयारी करो चूल्हा खाली है नंबर आ गया है

सारे परिजन बड़े खुश होते है की चलो मुक्ति मिली जल्दी से काम खत्म हो घर जाएं और वे लोग मृतक को उठाकर चूल्हे पर रख देते हैं लकड़ियों के बीच मे वो शरीर धू धू करके जलने लगता है

उसका सूक्ष्म जीव अपने शरीर को जलते देख रहा था और देख रहा था की और लोगो के परिजन राख के ढेर को छोड़ कर जा रहे हैं

सूक्ष्म जीव अब ये सब देखकर मुक्त हो चुका था और सबको सलाह दे रहा था की

हरदम है तयार तु पाप कमाने के लिए कुछ तो समय निकाल हरि गुण गाने के लिए, प्रभु को पाने के लिये

हाड़ जले जैसे सूखी लकड़ी केश जले जैसे घास रे, कंचन काया पल मे जल गई कोई न आया पास रे चार jan

जन रोएंगे बस दिखाने के लिए कुछ तो समय निकाल हरि गुण गाने के लिए प्रभु को पाने के लिये

और वो सूक्ष्म जीव एक पत्ती पर ओस बनकर बैठ जाता है 🙏🏿🙏🏿🙏🏿🙏🏿

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