सदियाँ गुजर गई हो जैसे

जीवन तो आगे बढ़ता ही रहता है बीता समय वापस नहीं आता वो गाँव का जीवन, वो खेतों मे घूमना खेलना, गाय का दूध पीना, कुएं का पानी गर्मी के समय पीना, वो गुड़ का शरबत, मक्के की रोटी, दूध की मोटी मलाई खाना , नीम के पेंड के नीचे खेलना

आज जैसे सदियाँ गुजर गई बस आज वो याद रह गई

पूरा गाँव खाली हो गया जीतने बूढ़े थे आज दिखाई नहीं देते

वो टूटे हुए घर

बिखरे हुए छप्पर, वो नीम का पेंड आज भी है और कहता है की सब चले गए कोई बच्चा अब उसके पास नहीं आता उसके लिए भी सब सपना हो गया

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