अपने मुह को ढके हुए सुरुचि धीरे से उठने की कोशिश करते हुए गीता का हाथ पकड़ लेती है और वह आह करती हुई गीता के साथ जाती है
गीता उसे धीरे धीरे नहला देती है और कपड़े पहना देती है फिर भी सुरुचि अपना मुह ढके रहती है
गीता कहती है कि वैध जी आने वाले है कुछ खा लो तुम
और अंदर से कुछ खाने को लेने चली जाती है सुरुचि अस्वस्थ होने के कारण चुपचाप अपना मुह ढक कर अपनी जगह पर लेट जाती है पर पता नहीं उसे क्या याद आने लगता है वो समझ नहीं पाती की वो ये कौन सी जगह पर आ गई
जो उसे यहां लाया वो आदमी कहा गया
लेकिन वो अपनी आंख बंद कर लेती है उसके शरीर में बहुत पीड़ा हो रही थी इस लिए सुरुचि अपनी आंख बंद कर लेती है
इतने मे गीता सुरुचि के लिए हलवा लाती है और साथ में गर्म दुध
सुरुचि हलवा ले लेती है नहाने से अब उसका मन हल्का हुआ था गर्म पानी से नहाने के बाद उसके शारीर को आराम मिलता है
क्रमशः
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