देव दासी भाग 491

हलवा बहुत अच्छा लगा उसे कुछ समय की बात याद आ रही थी और वो सोंच रही थी कि ये जगह कुछ जानी पहचानी लगती है

ऐसा हलवा वो कभी खाया करती थी

ये मंदिर से आई घंटी की आवाज अनजानी सी नहीं है

वो महिला शायद कुछ पहचानी सी लगती है

कितने बरस पहले सबकुछ बीत गया क्या किस्मत मुझे फिर से वहीँ ले आई

कुछ समझ नही आ रहा है मुझे

ये सब क्या है ये सोंच कर वो उतावली हो गई थी परंतु कोई उसे बाहर जाने से रोकता है कौन है वह

मुझे तो सब कुछ देखना है

उसके दिमाग मे कुछ पिछली यादें बाकी है कुछ सवाल

ये कौन सी पहेली है अनसुलझी सी

वो यहां ही क्यों आई है उसे यहां से जानाँ चाहिए कुछ ठीक नहीं है यहां

लेकिन वो जाए तो कैसे और वो कहा जाए क्रमशः

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