देव दासी भाग 496

सुरुचि उन दोनों को जाते हुए देखती है

सुरुचि को कुछ याद आता है वो अपने बीते हुए पलों को याद करना चाहती है फिर से सब देखना चाहती है उसने तो सबकुछ पहचान लिया पर ये लोग उसे नहीं जानते

गीता भी सुरुचि को पहचान ना सकीं

पहले सुरुचि रानी की तरह थी आज उसकी हालत दासी से भी बदतर है

आज वो एक असहाय और बेबस महिला थी

वो फिर से सबकुछ देखना चाहती थी लेकिन अभी उसके शारीर मे इतनी शक्ति नहीं है कि वो चल सके

थोड़ी देर बाद गीता आती है कहती हैं कि वैध जी आ रहे हैं तुम तैयार हो या उन्हें बाहर रोकें

सुरुचि अपने सिर को ढाक लेती है और कहती है कि मैं तैयार हू वैध जी को भेज दो

वैध जी अंदर दाखिल होते है गीता, कामिनी भी साथ मे खड़ी हुई थी

गीता कहती हैं वैध जी इसे कोई अच्छी सी दवाईयां देना जिससे कि ये जल्दी ठीक हो जाए

हा हा जरूर जरूर दवा देंगे

वे सुरुचि का हाथ देखते है उसके सुंदर हाथ देखकर वैध जी कहते है कि इसके अभी बुखार है क्रमशः

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