मैं देखती हू एक सच्चे सुख को अपने अंदर

हमारा मन पंछी की तरह हर जगह विचरण करता है

हर जगह भागता है

कौन सी वस्तु उसे अपने रंग मे रंग ले ये हमे भी नहीं मालूम

लेकिन मन हमारी आशा को कभी भी हताश नहीं करता

मन को काबू मे रखना हमारे वश में ही है

किसी भी वस्तु के लिए मन आतुर कब होता है जब कोई वस्तु हमारा आँखों को अच्छी लगती है

लेकिन सुख किसी भी वस्तु मे नहीं है

सारी वस्तुएं अच्छी है और अगर मेरी प्रारब्ध मे होंगी तो हमारे पास वो किसी ना किसी रूप में जरूर आएंगी

परंतु हम उनसे सुख की आशा करने के बजाय सिर्फ उनका उपयोग करें

सही तरीके से

अब एक उदाहरण एक शराब की बोतल भी आपकी प्रारब्ध मे जरूर ही आएगी, सिगरेट भी गुजरेगा, एक सुन्दर लड़की भी आएगी आपकी कामुकता को शांत करने के लिए

लेकिन मन तो रास्ता भी दिखाता है अगर आपकी बहुत इच्छा है तो मन आपको उसकी तरफ ले जाएगा

लेकिन मन की लगाम तो आपके हाथ मे आपके विवेक बुद्धि भी आपके साथ है

आप मन को समझाने नहीं, शराब पीना गंदी बात, सिगरेट पीने से कैंसर हो जाएगा, लड़की से नाजायज सम्बंध बनाने से संस्कारों को नुकसान होगा

तो आप वहां से अवश्य ही हट जाओगे अगर आप हट गए तो यहीं से आपका दुख खत्म और सुख के दिन शुरू

दूसरी बात अगर आप मेहनत की तरफ बढ़ते है काम करते हैं किसी एसे उद्देश्य को पूरा करने के लिए या फिर किसी अन्य व्यक्ति की भलाई के लिए कोई कार्य करते हो तो वहा से आपका सुख शुरू होता है

सुख वस्तुएं इकठ्ठा करने मे नहीं है सुख किसी भी वस्तु को सही तरीके से उपयोग करने मे है। धन्यावाद

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