सुख की अधिक चाहत का कर्ज भी चुकाना पड़ता है

जो हमारी प्रारब्ध मे होगा वो सब कुछ हमारे कर्मानुसार आएगा सामने

लेकिन हम बिना कुछ कर्म किए हुए अपनी इच्छा के वशीभूत होकर ज़बर्दस्ती किसी भी सुख को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तो वो सुख बाद में बहुत बड़ी पीड़ा का कारण बन जाता है

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