क्यूँ गिराते हो बेवजह मुझे गिराने वालों
उठो खुदा की नज़रों में मुझे झुकाने वालों
मेरे माथे पर ना आयेगी कभी शिकन झमेलों की
तुम लाख बिछा लेना मेरी राहों में कांटे बिछाने वालों
यूँ तो आसान नहीं है राह कोई मोहब्बत की
मगर मैं खुश हूँ मुझे गरल पिलाने वालों
मैं उठ जाऊँगी गहरी नींदो में सोकर भी
मुझे बार-बार कफ़न उढ़ाने वालों….
एक दिन चमक जाऊँगी चांद सितारों के जैसी
तुम मुझे छू भी ना पाओगे मुझसे जलने वालों ….

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