
बचपन अक्सर गुनगुनाता है मुझ में
छोटी छोटी बातों पर खुश होने में
बड़ी बड़ी कोशिशों की नाकामी पर रोने में
हालात का मर्जी का ना होने में
फिर भी खुश होने की इच्छा से, खुश होने में
एक उम्रदराज मुस्कराता बताता है
बड़ा होना, बड़ा पेचीदा होता है
बामायने राज़ों में,बेक़ाबू ख्वाबों में
नादान को,तज़ुर्बे की फटकार से चुप कराने में
जिन्दगी की आसानी में उलझ जाने में
बड़ा पेचीदा होता है
और
एक मासूम ताकता रहता है
खुली बड़ी चमकीली आँखों से
उम्र के परदे के पीछे से
बढ़ती ढलती उम्र की हैरानी को..
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