मेरी व्यथा

रात घनी है गहन अन्धेरा किस पथ पर अब जाऊँ मैं ।।

पथरीली पगडंडी पर विजया कैसे पाँव बढ़ाऊँ मै।।

बहरो की बस्ती में, जाकर किसको आवाज़ लगाऊँ मै।।

अपने अन्तर्मन की पीड़ा कैसे उन्हें सुनाऊँ मैं।।

इस फरेबी दुनिया में किससे नजर मिलाऊँ मै ।।

कदम कदम पर धोखे है कितने धोखे खाऊँ मै।।

रेशम सी उलझी ज़िन्दगी को कैसे सुलझाऊँ मै ।।

पीकर जीवन विष का प्याला मन्द मन्द मुस्काऊँ मै।।

रात घनी है गहन अन्धेरा किस पथ पर अब जाऊँ मैं
.

लेकिन मिलता है किनारा मुझे जब मैं ये सोचती हू की केवल उलझने मुझे ही नहीं सभी को सहनी पड़ती है ये पीड़ा

अंधेरी रात जितनी भी हो कितने भी काले बादल हो लेकिन एक समय उनमे से भी रोशनी की छोटी सी लौ दिखाई देती है और हम अपना रास्ता चुन लेते हैं

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