उधर से प्रीति भी सुर्ख लाल साड़ी मे वहां पूजा की थाली लेकर आती है
रघु बरामदे मे खड़ा है
रिकी, रूपा, सुनीता और भाभी सभी महिलाएं पूजा करने के लिए खड़ी हुई थी
चंद्रमा को जल अर्पित किया जाता है
प्रीति रूपा को तिरछी नजरो से देख रही थी वो किसी के साथ नहीं थी वो अकेली ही पूजा कर रही थी
उसे अकेली देखकर सुनीता भी उसके पास जाकर खड़ी हो जाती हैं
पापा जी भी वहां आ जाते हैं वे दूर खड़े हुए हैं और देख रहे है
सुनीता मुह बनाकर कहती हैं कि वो आ गए कोई भी नहीं आया वो पहले ही आ गए आखिर किसी को मुह दिखाने आए है वे
प्रीति हंस कर कहती है कि प्यार है
प्रीति कहती हैं कि महारानी जी पूजा कर रही हैं व्रत भी कर रहीं है पिछले साल का अपमान भूल गई
खैर बेशर्मी की भी हद्द होती है
लेकिन चलो कोई तो होगा जो इसे देखने आया है अभी कुछ बाकी है लगता है क्रमशः

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