दुख की मूसलाधार बारिश

एक तो गरीबी

पति की प्राइवेट नौकरी

पति की बीमारी

लकवाग्रस्त

बुढ़ी सास

दो बच्चे

पति की नौकरी छूटना

पति बिस्तर पर

अब घर कैसे चले

अब स्कूल मे आया का काम करना

घर का खर्चा उन पैसों पर ना चलना

हलवाई के साथ पूरी बेलने का कार्य शुरू करना

लेकिन अब भी खर्चा ना चलना

अब रास्ते मे एक ठेला लगाने और उसने बिंदी, लिपस्टिक और महिलाओं के सामान बेंचने का कार्य करना उसमे भी घाटा का सामना करना

फिर covid के प्रकोप के कारण काम बंद होना

लेकिन दाद देनी चाहिए उसे वो हंसती रही संघर्ष करती रही

इस दुख की मूसलाधार बारिश मे छाया बनकर

खुद प्रकृति और कोई अदृश्य शक्ति उसकी रक्षा करती रही

आज उसकी दुकान वहीँ ठेले वाली चल रही है सारी महिलाये उसकी ही दुकान से सामान खरीद लेती है। मित्रों मैं भी उसकी दुकान से ही अपना सामान खरीदती हू और महिलाएँ उसे प्यार से उपहार, कपड़े भी देती है और उसकी मदद करती है

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