मेरी सहेली और मैं रोज कॉलेज मे टिफिन के समय एक ही बेंच पर बैठ कर खाना खाते थे
मेरी सहेली एक अनुसूचित जनजाति की लड़की थी परंतु मुझे अपनी सहेली से कोई शिकायत नहीं थी
वो स्वाभाव की बहुत अच्छी और मुझे बेहद प्यार करती थी
कई लड़कियां मुझसे दूर रहती थी परंतु मेरी सहेली मेरे दिल मे बस चुकी थी
वो अपने घर से कुछ भी लाती थीं मुझे देती मैं खाती
मैं कुछ लाती तो वो खाती
दोनों बहुत खुश थीं
वो मुझे अक्सर अपनी मम्मी के बारे मे मुझे बताती लेकिन बीच मे ही रुक जाती
मैं उससे पूछती की तुम रुक क्यु जाती हो अपनी मम्मी के बारे मे बताते बताते
क्या हुआ
उसकी आंख नम हो गई
वो कहने लगी कि उसकी मम्मी ऊंची जाति की थी परंतु मेरे पिताजी से प्रेम हो गया वो उनके साथ भाग आई
वो दूसरे गाँव की थी
दुश्मनी हो गई सबकी
मेरे चाचा को उन लोगों ने मार दिया
पिताजी को भी मारने पर तुले हुए थे
पिताजी ने गाँव की जमीन बेंच दी
अब वो रोज मेरी माँ को मारते है
बहुत कष्ट देते हैं
मुझे भी मारते है
मेरी छोटी बहन को उठाकर फेंक दिया वो भी बहरी हो गई
मैं क्या करूं
अपनी चाची के यहां पढ़ने आई हू
अब मेरी भी शादी पक्की कर दी
52 साल का एक अमीर आदमी है वो और मैं 16 साल की
मै तो अब चली जाऊँगी
दो महीने बाद मेरी शादी है
तुम्हें कार्ड दूंगी तुम आ सकना तो आना
मैं बहुत दुखी हुई लेकिन मैं क्या कर सकती थी
कुछ दिन के बाद उसने कॉलेज आना बंद कर दिया
मैं अकेली हो गई
वो मुझे कॉलेज मे कार्ड देने आई और देकर कुछ देर रुकी और चली गई उसके चेहरे पर दुख था निराशा थी
मैं कार्ड लेकर अपने घर गई और मम्मी पापा को दिखाया
पापा ने वो कार्ड फेंक दिया और कहा कि उसकी हिम्मत कैसे हुई तुम्हें कार्ड देने की और तुम ये कार्ड घर क्यु लाई मालूम है वो कितने नीच कुल कि है
उसकी शादी में तुम जाओगी
और मैं उसकी शादी मे नहीं जा पाई
मैं बहुत रोई सोंच मे पड़ गई कि ये जाति पाती कितनी खराब है जिसने मुझे अपनी इतनी प्यारी सहेली से अलग कर दिया
वो चली गई थी उसकी पढ़ाई भी छूट गई थी परंतु मैं वही जाकर बैठ जाती जहां पहले हम बैठा करते थे
उसकी याद नहीं जाती तब मोबाइल भी नहीं थे जो उसका नंबर ले लेती
😒😒😒
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