जैसी सोंच वैसा ही मिलेगा

ये बिल्कुल सत्य है

हम जैसी सोंच रखते हैं हमारा प्रकृति वैसी ही बन जाती है

जैसी भावनाओं का हमारे अंदर समावेश होता है उसी प्रकार का सारा दृश्य देखने को मिलता है

कुछ लोग अपनी भावनाओं के कारण उन्नति नहीं कर पाते है

अगर वे छल कपट करके कुछ वस्तुओं को पाते भी है लेकिन उन वस्तुओं से उन्हें शांति कम अशांति ज्यादा मिलने लगती है

हम अपनी अच्छी सोंच से अपने बेहतरीन भविष्य की कामना कर सकते हैं

अगर देखा जाए तो हम अगर ये सोंचते है कि सब लोग खुश रहेंगे तो हम भी खुश रहेंगे सब उन्नति करेंगे और हम भी उन्नति करेंगे

तो वास्तव मे ये हमारा अच्छी सोंच है और हम सुखी रहते हैं

अगर हम सोंचते है कि मेरे समान कोई उन्नति ना कर पाएं और मैं सबसे सुखी रहूंगा और सब मेरे आगे घुटने टेके तो ये सोंच बहुत बुरी है

अगर हम किसी असहाय की मदद करने की सोंच रखते हैं तो निश्चय ही हमारा भी भला होगा कोई मेरी भी मदद के लिए खड़ा हो जाता है

ये प्रकृति है इसमे अपने विचार एक चक्र की तरह पृथ्वी पर भी घूमते रहते है जो एक दिन हमारे कर्म बनके खड़े हो जाते हैं

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