वो आदमी दीपेन्द्र को जबरदस्ती वहां से निकलवाने के लिए बहुत डराता है परंतु दीपेन्द्र वहाँ से नहीं जाता है
वो दरबान था वो गेट के बाहर ही रहता था रात मे वो अपने घर चला जाता था
वो उस कब्रिस्तान में दरबान था
दरबान के चले जाते ही दीपेन्द्र एक बड़ी सी कब्र खोजता है
उस पर लेट जाता है
कहता है कि कितनी आराम
कितनी शांति
उफ्फ काश मुझे भी मिल जाती
बहुत ही सुंदर
चारो तरफ पेंड है
लेकिन वो देखता है कि एक बुढ़िया वहाँ पर घूम रही थी
ये बुढ़िया यहां क्या कर रही है वो छुपा लेता है अपने आपको एक कब्र के नीचे
बुढ़िया एक खुदाई करने के लिए कुछ हाथ मे नुकीली चीज लिए हुए थी
लेकिन वो कुछ नहीं कह सकता था
फिर वो देखता है कि वो बुढ़िया चुप चाप वहीँ पर बैठ जाती है और कुछ बोलने लगती है देखने में वो पागल लगती है
वो भी वही पर अपनी जगह मे लेट जाता है
वो देखता है कि आँधी आने वाली थी
धूल का एक गुबार आ रहा था
दीपेन्द्र तुरंत समझ गया कि अब आँधी आने वाली है
अब वो थोड़ी दूर ही एक कमरा जैसा बना हुआ था वो उसमे ही दौड़ कर घुस जाता है
क्रमशः

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