देव दासी भाग 500

उधर सुरुचि के मन में क्या आ जाता है सब लोग चले जाते हैं तो उसे फिर से घंटी की आवाज सुनाई देती है और वो सोचती है कि वैध जी ने मुझे नहीं पहचाना लेकिन मैंने सबको पहचान लिया है

ये तो वीर सिंह का परिवार है अगर उन्होंने मुझे पहचान लिया तो वे मुझे और मेरी बेटी को मार देंगे

लेकिन मेरी बेटी है कहा

मुझे यहाँ से निकलने का रास्ता तय करना होगा

मुझे जाना-पहचाना लगता है सब कुछ

लेकिन मैं जाऊँगी कैसे

और कहाँ जाऊँगी मैं

मेरे पति का भी कुछ पता नहीं वे कहाँ है सब कहाँ चले गए

कितनी जल्दी समय बदल गया

सब बिछुड़ गए चले गए

सब कुछ एक सपने जेसा हो गया

लगता है यहां से कुछ दूर पर ही वो सब होगा

वो धीरे धीरे से चलने लगती है कि कोई आहट ना हो

बाहर निकलते ही गीता मिल जाती है वो कहती हैं कि तुम कहां जा रही हो बहन

सुरुचि कहती हैं कि कहिं नहीं बस ऐसे ही कुछ मन घबरा रहा था

गीता कहती हैं कि तुम यहां सुरक्षित हो तुम्हारे पति सौम्य सिंह के यहां है

सुरक्षित हैं तुम्हारी बेटी भी जल्द ही आ जाएगा

मुझे तुम्हारे बारे मे सब पता है

लेकिन वीर सिंह तुम्हें ठीक से नहीं जानते है

क्रमशः

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