प्रीति की उलाहना सुनकर प्रकाश ने कुछ नहीं कहा वे सुनते रहे
रिकी ने भी कुछ नहीं कहा वो जानती थी कि कुछ कहने से बेकार की लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाएंगे और अशांति होगी
पूजा समाप्त होती है
रघु वहाँ धीरे धीरे आते है और वहां का नज़ारा देखते हैं
रूपा रघु को देखकर डर जाती है वो सोचती है कि कहीं फिर अपमान ना हो जाए वो रघु के हाथो और सभी के उपहास का पात्र ना बन जाए
वो अपनी थाली लेकर वहां से खिसक लेती है
रिकी भी रूपा के साथ चली जाती है उधर प्रकाश सुनीता को पानी पिलाते है
रघु प्रीति से कहता है कि लो तुम भी जल पीओ और उसे पानी पिलाता है
कहता है कि तुम तो कोल्ड ड्रिंक और नमकीन खा चुकी थी तुम्हारा बर्तन अभी भी बेड के नीचे रखें हुए है और व्यंग से हंसता है
प्रीति बिना रघु के पैर छू वहां से चली जाती है उसके अंदर चिड़चिड़ापन और गुस्सा भरा हुआ था
उधर सुनीता भी प्रकाश के चरण स्पर्श करके वहा से प्रीति के पीछे पीछे चली जाती है
तभी प्रकाश कहते हैं कि रूपा हर साल भूखी ही सो जाती है बेचारी आज भी उसे भूखा सोना पड़ेगा
उधर रिकी अपने पति से फोन मे बात कर रही थी वीडियो कॉल मे अपने पति को देख रही थी और उनसे बात कर रही थी
रघु कहता है कि इतना अपमान तिरस्कार करने के बाद भी रूपा व्रत करती है पापा जी
प्रकाश कहते हैं कि और नहीं तो क्या
खैर तुम्हें क्या मतलब उससे
तुम जाओ प्रीति के पास
रूपा तो अकेली ही ठीक है वो तो तुम्हारी ना थी और ना ही है
रघु पापा जी को बड़ी गंभीरता से देख रहा था
क्रमशः

टिप्पणी करे