देव दासी भाग 501

सुरुचि गीता की बात सुनकर कहती हैं कि मैं यहाँ भूल से आ गई हू मैं जाऊँगी यहां से मुझे जाने दो

गीता कहती हैं कि चली जाना लेकिन अभी तुम्हारी बेटी की जान खतरे में है

अभी तुम कहीं मत जानाँ

सुरुचि कहती हैं कि वीर सिंह को मेरे बारे मे कुछ मत बताना दीदी

गीता कहती है कि अच्छा मैं नहीं बताऊंगी कुछ भी

सुरुचि कहती है कि मैं थोड़ी देर के लिए बाहर की साँस लेना चाहती हू

बहुत दिनों से डाकुओं के साथ पहरों मे थी बहुत घुटन होती थी

गीता कहती हैं कि डाकुओं के साथ रहना काफी मुश्किल और खतरनाक होता है

सुरुचि कहती हैं कि वो लोग मुझसे सारा दिन काम करवाते थे

हर समय जान का खतरा मंडराता रहता था

परंतु मुझे अपनी परवाह नहीं थी अपनी बेटी की परवाह थी

गीता कहती हैं कि मुझे ये बताओ की तुम रहीं कहा इतने दिन

सुरुचि कहती हैं कि अब मुझे उतना याद भी नहीं है

सब कुछ गुजर गया अब

गीता कहती हैं कि सभी भी इस उम्र मे भी तुम कितनी सुंदर हो तुम्हारे बाल भी पहले जैसे ही हैं तुम्हारी आंखे भी पहले जैसी है लेकिन आँखों के नीचे कुछ काले रंग के दाग बन चुके हैं। क्रमशः 🌿🌿

3 responses to “देव दासी भाग 501”

  1. Is that your painting?
    Sorry I don’t know, so I’m asking.

    Very beautiful painting.

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    1. This is a story, read it, translate it, there is a Dev Dasi tradition in India, it is based on that, you can translate it

      Liked by 1 व्यक्ति

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