सेवा करने वाले को निस्वार्थ भाव से सेवा करनी चाहिए जब हमें कोई स्वार्थ ही नहीं है तो महत्व हो या ना हो, हम कर्म में क्यु बंधे, किसी की सेवा की वो हमारा कभी उससे कुछ बचा होगा, सेवा किसी की भी हो ये नहीं सोचना कि हमारे द्वारा कोई कर्म किया गया, प्रकृति भी सब देखती है अगर हम किसी को राहत देने का निर्णय करते हैं या किसी की परेशानियों मे राहत पहुंचाते है तो बाद मे हमें उससे कोई भी फायदा या कुछ बदले का भाव नहीं रखना चाहिए, सेवा की वो प्रकृति द्वारा कोई रचित रचनात्मक भूमिका होगी जो हमारे सामने आई जो किया सो गया अब आगे बढ़ जाना चाहिए
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