हँसते कभी रूलाते हमको वो दिन कितना याद आते हैं
वो मतवाले दिन भुलाए नहीं जाते
बचपन की यादों में बीत जाते हैं कुछ एकान्त के पल
भोलेभाले दोस्तों के साथ बिताते थे कुछ पल
पापा के कंधे पर बैठ कर
घूमें हम तो मेलें मे
पेड़ो की डाली पर झूले कच्चे फल तोड़ लाते थे
मिट्टी में भी खुद को सराबोर कर लिया लिया लिया करते थे
फिरकी लिए पूरे मुहल्ले मे घूमते थे
फिरने वाले दिन कितना याद आते हैं
लुका छिपी गिल्ली डंडा हाथ मे लिए हुए मचलते थे
खेलों वाले दिन भी खूब याद आते हैं
लिए चवन्नी जेब में अपनी कितना इतराते थे
दिन भर गश्त लगाते मेले ने पापड़ी लेकर खाते थे
पापा के आने से पहले घर मे घुस जाते थे
घर पर नजर थे आते
शैतानी पर मम्मी से डरते थे
पिटने वाले दिन याद आते है
चूल्हे की रोटी की दाल सुखी कितनी मजे से खाते थे मानो
सौंधी खुशबू वाले चॉवल भूख मे लगते थे
बुआ चाची दादी नानी मौसी मामा
थे सभी मोहल्ले वाले रिश्ते अनजाने
अपनेपन के रिश्ते अनमोल थे
कोई नही थे दिल के काले सब थे कितने भोले भाले
तारे गिनगिनकर सोते थे
छत पर सोने वाले दिन नींद मे जैसे खोते टी
खट्टी मीठी मुस्कानों की वो दिन कितने
मुस्कानों वाले दिन थे जो आज याद आते थे
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