देव दासी भाग 502

गीता की बात सुनकर सुरुचि कहती है कि मेरा कोई मकसद नहीं है मैं यहां कैसे आई मुझे कुछ भी पता नहीं

तुम्हारी किस्मत तुम्हें यहां लाई तुम किस्मत के वशीभूत हो तुम्हारा कोई दोष नहीं

तुमने अपने बच्चों को देखा है अभय और रोहित दोनों बेटे बड़े हो गए हैं

वो मेरे बेटे अब नहीं है वो कामिनी दीदी के बेटे है उन्होंने उन्हें पालने में कितनी मेहनत की होगी

दीदी मैं तुमसे हाथ जोड़ती हू की तुम उन्हें कुछ भी मत बताना मेरे अतीत के बारे मे किसी को भी पता न चले

मेरी काली छाया भी किसी के ऊपर ना पड़ जाए गीता दीदी

मैं अभागिन हू

मैं बेबस हू

मैं अबला हू

मैंने अपने विवेक को त्याग कर एक गलती की जिसकी मुझे सजा भोगनी पडी

गीता कहती है चली जानाँ तुम मैं तुम्हें नहीं रोक सकती

लेकिन मेरी इतनी सी बात मान लो कि तुम अपना ध्यान रखो तुम्हारी बेटी आ जाएगी अगर तुम्हें कुछ हो गया तो वो बिचारी कहाँ जाएगी तुम्हारे सिवा तो उसका कोई नहीं है

कहीं जाने की कोशिश मत करना वर्ना तुम्हारी वज़ह से कितने लोग खतरे मे पड़ सकते हैं

क्रमशः

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