मैं भले ही इक कन्या कुंवारी थी
पर मैं तब तक जीवित तो थी
जैसे ही मेरी मृत्यु करीब आई
ब्याहता बन उसके अंगना पहुंचाई।
जब तक इस संसार में जीती रही
बाबा की परी मैं भी कहलाती रही
मृत्य शैया पर जब आज मैं पहुंची
उन लोभियों ने मेरे तन को बेची
कहां गया वह न्याय का सौदागर
कहां गया वह समाज का ठेकेदार
जिसने मेरी उस संग मेल कराई
जीते जी मेरी शव सैया बिछाई
जाऊं तो जाऊं अब मैं किसके पास
नहीं जीवित हूं आज मैं किसी के पास
बताओ अब किसकी कुंडी खटखटाऊं
कौन होगा जो कहे चल तुझे जीवंत बनाऊं
आज तुम सब कह ही दो मुझको
क्या मैं मरकर भी ऐसे आंसू बहाऊ
या फ़िर आज मेरे बाबा से कह दूं कि
मेरी बहनों की ऐसी जगह न ब्याह कराना
गरीब घर में ब्याह देना पर ज़िंदा तो देखोगे
न रोना मेरी किस्मत पर मेरी यही तकदीर थी
न हि लोभियों को जीने देना जिसने मेरी सांसे छीनी।
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