देव दासी भाग 503

सुरुचि की बहुत बड़ी विडम्बना थी कि आज वो जीवन के उस कठिन पल को याद नहीं करना चाहती थी वहीँ आज फिर से अपना विकराल रूप धारण कर के उसके सामने आकर प्रकट हो गया जेसे आज उसके आंख का नीर सूख गया

वो उन पलों को अपनी स्मृति से अलग करना चाहती है वो अब कुछ भी याद नहीं करना चाहती और ना ही वो उन बिताएं हुए पलों से जुड़ना चाहती है वो अब दूर चली जाना चाहती है

बहुत दूर की उसकी किसी भी प्रकार की दुविधा न पड़कर अब वो इस जीवन से मुक्त होना चाहती है परंतु वो अपने जीवन को समाप्त अपने हाथो से नहीं करना चाहती

अभी उसे बहुत अनुभव एकत्र करने है तभी लोगों से उसका ध्यान हटेगा और वो जीते जी मुक्ति की ओर बढ़ना आरंभ करना चाहती है

अपने मन की पीड़ा को वो किसी को आगे प्रस्तुत करना नहीं चाहती ना ही वो अब रोना चाहती है क्रमशः

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