देव दासी भाग 504

सुरुचि एक तरफ चुपचाप बैठी अपनी आजादी का इंतजार कर रही है वो सोंच रही है कि शायद उसकी गलती की ही कोई सजा वो और उसकी बेटी भोग रही हैं

सुरुचि सोचती है कि कभी भी अपने सुख के लिए अपना विवेक नहीं खोना चाहिए मैंने अपनी ओछी वासना की पूर्ति के लिए बिना विवाह किए एक पुरुष की मीठे शब्दों में खुद को भूलकर अपने सुख को अवैध रूप से भोगा था

जिसके परिणामस्वरूप उसे अपनी नवजात बेटी को मंदिर में छोड़ना पड़ा

और उस छोटी बच्ची ने कितने कष्ट उठाए होंगे

लेकिन अब वो अपनी बेटी को कष्ट नहीं उठाने देगी वो अपनी बच्ची के लिए कुछ भी करेगी

तभी सुरुचि को नींद आ जाती है और उसकी आंखे बंद हो जाती है

कामिनी गीता से सुरुचि की खबर लेती है और वो खुद ही सुरुचि के कमरे मे जाती है लेकिन वो सुरुचि को सोता पाकर वहाँ से लौट आती है

कामिनी गीता से कहती है कि ये तो सोते हुए ही मिलती है मुझे ये कोई बात भी नहीं करती

लगता है कि इसको मन मे कोई गहरा दुख है

मुझे तो इसका नाम भी नहीं पता है

गीता कहती हैं कि जिसकी बेटी मुसीबत में है उसकी माँ खुश कैसे हो सकती है क्रमशः

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