प्रसाद का तिरस्कार

भगवान जगन्नाथ जी का प्रसाद एक मंदिर में मिल रहा था सब लोग प्रसाद कहा रहे थे

तभी एक आदमी एक बहुत बड़ी गाड़ी से उतरा और उसने भी प्रसाद के लिए लाइन लगाई वो देखने मे बहुत अमीर लगता था लेकिन प्रसाद खाने के लिए उसका इस तरह से गरीबों के बीच मे खड़े देखकर एक आदमी मंदिर से बाहर निकला और एक सुन्दर सी थाली मे उस आदमी को प्रसाद देते हुए बोला कि साहब आप यहां मत खड़े होइए आपका यहां पर लाइन लगाए है शोभा नहीं देता लाइन बहुत लंबी है आपको देर लगेगी साहब आप तो इससे बड़ा और अच्छा प्रसाद घर में बनवा सकते है

लेकिन उस आदमी ने उसकी थाली वापस कर और बोला कि नहीं जब मेरा नंबर आएगा तब मैं प्रसाद लूँगा भगवान के दरबार मे सब बराबर है

एक और आदमी सारी बातें सुन रहा था जब वो आदमी चला गया तो वो गरीब आदमी उस अमीर आदमी के आगे हाथ जोड़ते हुए बोला कि साहब आप तो इस मंदिर मे चंदा देते हैं आप यहां हम छोटे लोगों के बीच मे क्यों लाइन लगाए खड़े हो प्रसाद तो केवल खिचड़ी का है आप बड़े लोग है खिचड़ी खा पाओगे

तब उस अमीर आदमी ने कहा कि वो जगह देख रहे हों

हा वहाँ तो सुनसान पड़ा है वहाँ कोई नहीं रहता

आपको शायद याद नहीं है भैया

मैं अपनी माता के साथ वहाँ रहता था मेरे चार भाई बहन थे

पिता बचपन मे ही मर गए थे

हम लोग यहा पर एक मिट्टी के घर मे रहते थे और इसी मंदिर का प्रसाद खाते थे

धीरे धीरे हम लोग चावल बेंचने लगे

मैं बड़ा हुआ

धीरे धीरे हम गुड़ बेंचने लगे आज भगवान की दया से किसी चीज की कमी नहीं जब भी प्रसाद देखता हू मैं अपनी गाड़ी से नीचे उतर कर खाता हू छोड़ कर जाना प्रसाद का तिरस्कार है मैं वो पाप नहीं कर सकता

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