देव दासी भाग 505

लेकिन सुरुचि गहरी निद्रा मे सो रही थी

कामिनी उसे देखकर बहुत ही दुखी होती है कि ये कितनी बदनसीब है

सबकी किस्मत एक जैसी नहीं होती एक मेरी किस्मत देखो मैं कितने अमीर परिवार की ठाकुर की बेटी

कितने आरामदायक जीवन मे रही

चार भाइयों मे अकेली बहन थी कामिनी

सुंदर सुशील और पिता व्यापारियों के साथ व्यापार करते थे भाइयों का भी अपना अपना व्यापार था

भाभियों का परिवार भी अमीर था

बाहर बाहर दूसरे शहरों तक सबका व्यापार फैला था

किसी भी वस्तु की कमी ना थी

वीर सिंह के पिताजी आते जाते थे उनका भी पिता के व्यापारिक संबंधों मे एक दूसरे से जुड़े हुए थे

वीर सिंह भी अपने पिता का हाथ बंटाने वहां पर आ जाते थे

वीर सिंह का शरीर और रूप देखने लायक था

कामिनी भी वीर सिंह को छिप छिप कर देखती थी शायद उसके मन मे वीर सिंह के लिए प्रेम का अंकुर फुट रहा था

कामिनी भी वीर सिंह को देखने के लिए बैचैन रहती थी

और उनका इंतजार किया करती थी

वो प्रार्थना करती थी कि वो वीर सिंह की जीवनसाथी बने परंतु वीर सिंह उसकी तरफ देखते तक ना थे। क्रमशः

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