सुरुचि सो रही थी कामिनी उसे देखकर सोचती है कि ये भी एक नारी है कितनी बेबस लगती है और मैं अमीर होते हुए भी बेबस ही थी
भाइयों के बीच मे रहना
बंधन ही बंधन था उसे
सहेली के घर भी जाती थी तो भाभी लोगों के साथ या माँ के साथ
कितनी लाडली थी
सब कितना प्यार करते थे उसे
सुंदर भी थी
लेकिन वीर सिंह उसकी तरफ देखते ही नहीं थे
उनकी चौड़ी छाती, बड़ी बड़ी आंखे, उनका गेहुंआ रंग ,उनकी आंखे लाल हो जाती थी गुस्से से
आवाज कड़क थी
उनकी आवाज सुनकर कामिनी दौड़ कर उन्हें देखने चली आती थी
छिप छिप कर उन्हें देखती थी मंदिर मे भगवान से उनके लिए विनय करती थी कि वीर सिंह को अपना पति मान लिया है अब और किसी को देखू ना और किसी की ना बनूँ सिर्फ वीर सिंह की ही दासी बनूँ
अखिरकार भगवान ने उसकी आराधना सुन ली वो वीर सिंह के लिए व्रत भी करती थी
लेकिन उसे पता नहीं था कि प्रार्थना से पाई गई वस्तु हमेशा दुख ही देती है
आखिरकार भगवान ने उसकी पुकार सुनी और एक दिन बड़े भाई को कहते सुना कि पिताजी ठाकुर वीर सिंह के साथ अगर कामिनी का ब्याह कर दिया जाए तो कितना अच्छा होगा। क्रमशः

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