माधुर्य

माधुर्य बिखरने की कला सबको नहीं आती ये एक एसी कला है जो किसी के होठों पर होती है, जब कोई सकारात्मक भाव से हमारे पास बैठता है और अच्छी अच्छी बाते करता है और उसकी वाणी फूल के समान होती है

उसके विचार एक निर्मल झरने की तरह होते हैं वो जहां भी जाता है वहां एक सुन्दर आभा और अपनी ज्ञान की बूंदे बिखेर देता है जिसकी शीतलता मे कई लोगों को जीवन की तपिश और संघर्ष की थकावट से कुछ राहत मिलती है

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