भारत के उत्थान पतन की कहानी”84 जन्मों की कहानीमस्तक में भाग्य की रेखा की चमकनैनों में पवित्रता की झलकहोठों पे मुस्कानवाणी में मधुरताकर्म में सन्तुष्टताव्यवहार में नम्रताजीवन में संपन्नताचाल में धैर्यताचलन में श्रेष्ठताचरित्र में महानताविचारों में शुद्धताबुद्धि में दिव्यतासंस्कारों में सर्व गुण संपन्नतास्वाभाव में सरलताहृदय में विशालताचित में शीतलतादिल में सत्यताभावना में शुभ भावनाभाव में आत्मिक भावएक समय था जब भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था।यही भारत भूमि कभी हेवन, पैराडाईज, खुदा का बगीचा, जन्नत, स्वर्ग, बैकुंठ आदि नामों से जाना जाता था।क्योंकि यहाँ रहने वाले हर आत्मा संपूर्ण निर्विकारी, सर्व गुण संपन्न ,16 कला से संपूर्ण थे।परन्तु जब जन्म लेते लेते आत्माऐं , गुण और कला विहीन हो गयी, तो वही भारत जो सोने की चिड़िया था, लोहे की चिड़िया बन गया है।फिर से वक्त आ गया है, परमात्मा पिता की मदद से सर्व गुण सम्पन्न, 16 कला संपूर्ण बन सुख शान्ति से भरपूर बनाने का।और अपने भारत को जन्नत , पैराडाईज, हेबिन बनाने का।क्योंकि वर्तमान समय इस सृस्टि नाटक का सबसे महत्वपूर्ण समय है क्योंकि यह समय कलियुग और सतयुग के संगम का समय है जहाँ आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।इसलिए ही इस समय को “कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगमयुग” कहते हैं।कल हम जानेंगे परमात्मा पिता को यथार्त याद करने की विधि जिससे ही हम सर्व दुखों से सदा के लिये मुक्त हो सकते हैं।
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