आंसुओ के सैलाब



गर आंसू आएं तो रोक लेना उन्हें
मत ढूंढना कांधा किसी गैर का
जब खाएं हों ज़ख्म अपनो से ही
फिर कोई अपना क्या पराया क्या
बस पोंछ लेना उन्हें अपने ही कंधे से
बन जाते है…खुद की सजा अपने ही
कभी कभी….

फिर वो गैरों की फेहरिस्त में शामिल हो
जाया करते है…

नमी ही तो होती है…. आंसुओं की बस…
उस पर कहां किसका नाम लिखा होता है…..
बस जख्मों पर ही तो छाप पड़ी होती है
उनकी….

जब आह निकलती है… तो बस नाम ले
लेती है… वो
मगर आहों को भी छिपा लिया हमने इस कदर…

न सिसकियां ही आती है… अब
न ही आहें निकलती हैं…

बस निकलती है… तो बस…
एक मुस्कुराहट होठों पर आ जाती है
निखर के…
एक मुस्कुराहट होठों पर आ जाती है
निखर के…

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