आईना

बात संस्कारों की उठती है जब कोई बहू सलीके से ससुराल मे रहती है, बहू कुछ मायके से लेकर आती है और कुछ संस्कार उसकी ससुराल द्वारा दिए जाते है



छोटी बहू जब नयी-नवेली दुल्हन के रुप में घर आई। तभी उसने अपने ससुर को सास से कहते सुना- हमारी बड़ी बहू तो तेज-तर्रार है ही; ये छोटी न जाने कितनी तेज होगी? एक तो माॅडन जमाने की। दूसरे नौकरी पेशा। बन भी पाएगी इन दोनों की आपस में? निराश भाव से सास कहने लगी- हमें क्या करना है इनसे? हम तो न जाने कितने दिनों के मेहमान हैं यहां? हमने अपने नाम पर भी जमीन, जायदाद, रुपया, पैसा। रखा होता तो इस चौथी अवस्था में ऐसे क्यों रहना पड़ता? मेरे अंतर्मन से तो इनके लिए दुआ या आशीष तक नहीं निकल पाती। ऐसी बातें सुनकर नई बहू के लिए सास-ससुर के विरुद्ध बनी-बनाई परंपरागत बात सिद्ध हो गई।
सास-ससुर बीते दिनों को याद करते कि- बेटों के अथाह परिश्रम से ही पिता का छोटा सा व्यवसाय उनको खूब फला-फूला। कुछ समय बाद बड़े बेटे ने कोर्ट मैरिज कर ली। जल्दी ही घर पर बहू का “सिक्का जम गया” बुढ़ापे की समस्याओं को समझे बिना वह बार-बार अपने सास-ससुर से कहती- मम्मी जी,पापा जी आपको कभी-कभी मंदिरों और तीर्थो में भी जाना चाहिए। बहुत खीझते हुए ससुर ने एक बार कह ही दिया- बहू इस बुढ़ापे में हमारा घर ही हमारे लिए मंदिर और तीर्थ हैं। बिना सहारे के हम कहीं आ-जा भी नहीं सकते। इसलिए अपने सुझाव हमें न दो। ससुर की इस सच्ची बात का बहू ने ऐसा बतंगड़ बनाया कि वह बतंगड़ उनके लिए श्राप बन गया।
इधर माह भर ससुराल में रहते हुए भी छोटी बहू परिजनों से बहुत ज्यादा बातें नहीं करती। न ही वह सास-ससुर या अन्य परिजनों को बड़ी बहू के समान मम्मी, पापा आदि कहती। उसमें एक बात विशेष थी, वह रोज ऑफिस जाते समय और वापस आने पर अपने सास-ससुर के चरण स्पर्श करती।
एक बार ऑफिस जाते समय प्रणाम करने पर उसकी सास ने कुछ झेंपते हुए पूछ लिया- बहू! तुम भी बड़ी बहू की तरह हम सबको मम्मी-पापा, दीदी-भैया करके नहीं बोलती हो? वह बिना कुछ बोले ही थोड़ा मुस्कुरा कर चली गई।
शाम को ऑफिस से लौटकर सास-ससुर घर में नहीं दिखाई दिए तो, उसे लगा वे परिवार के बड़े हैं, गये होंगे कही? बहुत समय बीत जाने के बाद भी वे घर में नहीं दिखाई दिये तो, पति से पूछने पर पता चला कि- उन्हें वृद्धाश्रम में रहना पड़ रहा है; सिर्फ उनकी शादी पर बुलाया था। यह वास्तविकता सुनकर छोटी बहू के पैरों तले जमीन खिसक गई। पति आगे कुछ कहता, वह उसी क्षण सास-ससुर को वृद्धाश्रम से घर ले आयी। उन्हें घर में देख जेठानी “आग बबूला होकर” कहने लगी- इन दोनों ने अपने बेटों के लिए कौन-सा जमीन जायदाद.. उसे रोकते हुए देवरानी बोली- ये सब बातें तो मैं पहले भी सुन चुकी थी, पर समझ में अब आई। आज तुम्हारे पास जमीन-जायदाद, रुपये पैसों की तो कमी नहीं?
सास को मां, ससुर को पिता, जेठ और देवर को भाई, ननदों को दीदी या बहन कहने से उनका भाव तो बदलता नहींं? वास्तव में पति के माता-पिता होने के नाते वे हमारे सास-ससुर ही रहेंगे। इन रिश्तों के इतने सम्मानजनक नाम पहले से ही हैं तो, मात्र उन्हें बदलकर बोलने से स्नेह और सम्मान ज्यादा नहीं हो जाता? अपने बेटों व उनकी संपत्ति पर अधिकार माता-पिता का ही है, हम तो बाद के हकदार हैं। कम बोलने वाली बहू ने अपने कर्तव्य निभाकर सभी परिजनों को आईना दिखा दिया।


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